|
| |
| |
श्लोक 12.164.13  |
एष ते भरतश्रेष्ठ नृशंस: परिकीर्तित:।
सदा विवर्जनीयो हि पुरुषेण विजानता॥ १३॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| हे भारतश्रेष्ठ! इस प्रकार आपके प्रश्न के अनुसार यहाँ क्रूर पुरुष का परिचय दिया गया है। बुद्धिमान पुरुष को इससे सदैव दूर रहना चाहिए। 13॥ |
| |
| Bharatshrestha! Thus, according to your question, a cruel man has been introduced here. A wise man should always stay away from it. 13॥ |
| |
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि नृशंसाख्याने चतु:षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६४॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें नृशंसका वर्णनविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६४॥
|
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|