श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 164: नृशंस अर्थात् अत्यन्त नीच पुरुषके लक्षण  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.164.1 
युधिष्ठिर उवाच
आनृशंस्यं विजानामि दर्शनेन सतां सदा।
नृशंसान्न विजानामि तेषां कर्म च भारत॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा- हे भरतपुत्र! मैं सज्जन पुरुषों से सदैव मिलकर और उन्हें देखकर कोमलता से व्यवहार करना जानता हूँ। किन्तु क्रूर लोगों और उनके कर्मों के विषय में मुझे अधिक ज्ञान नहीं है॥ 1॥
 
Yudhishthira asked- O son of Bharat! By always meeting and seeing noble men, I know how to behave with tenderness. But I do not have much knowledge about cruel people and their deeds.॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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