Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.163.6-7h: पृथ्वीनाथ! अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि वे कहाँ से उत्पन्न होते हैं? वे कैसे स्थिर रहते हैं? और कैसे नष्ट होते हैं? हे राजन! सबसे पहले मैं क्रोध की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन करूँगा। इस विषय को एकाग्र होकर सुनो। 6 1/2। | mahabharat अध्याय 12.163: काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
एतेषामुदयं स्थानं क्षयं च पृथिवीपते।
हन्त ते कथयिष्यामि क्रोधस्योत्पत्तिमादित:॥ ६॥
यथातत्त्वं क्षितिपते तदिहैकमना: शृणु।
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि वे कहाँ से उत्पन्न होते हैं? वे कैसे स्थिर रहते हैं? और कैसे नष्ट होते हैं? हे राजन! सबसे पहले मैं क्रोध की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन करूँगा। इस विषय को एकाग्र होकर सुनो। 6 1/2।
Prithvinath! Now I am telling you from where they are born? How do they remain stable? And how do they get destroyed? O King! First of all I will describe the origin of anger in detail. Listen to this topic with concentration. 6 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥