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mahabharat 12.163.17: मन में कामनाएँ रखने और दूसरे प्राणियों के सुख और आनन्द को देखने से ईर्ष्या उत्पन्न होती है और विवेकशील मन से उसका नाश हो जाता है ॥17॥   |   mahabharat अध्याय 12.163: काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 163: काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.163.17 
ईर्ष्या कामात् प्रभवति संहर्षाच्चैव जायते।
इतरेषां तु सत्त्वानां प्रज्ञया सा प्रणश्यति॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मन में कामनाएँ रखने और दूसरे प्राणियों के सुख और आनन्द को देखने से ईर्ष्या उत्पन्न होती है और विवेकशील मन से उसका नाश हो जाता है ॥17॥
 
Jealousy arises from having desires in the mind and seeing the happiness and joy of other beings and is destroyed by a discriminating mind. 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)