अध्याय 163: काम, क्रोध आदि तेरह दोषोंका निरूपण और उनके नाशका उपाय
श्लोक 1-2: युधिष्ठिर ने पूछा - भरतश्रेष्ठ! परम बुद्धिमान पितामह! क्रोध, काम, शोक, मोह, विधित्सा (शास्त्रविरुद्ध कार्य करने की इच्छा), परशुता (दूसरों को मारने की इच्छा), मान, लोभ, मद, मत्सर, निन्दा, दोष और कृपणता (दान की भावना) - ये सब दुर्गुण किससे उत्पन्न होते हैं? मुझे ठीक-ठीक बताइए। 1-2॥
श्लोक 3: भीष्म बोले, 'महाराज युधिष्ठिर! आपके द्वारा बताए गए ये तेरह दोष जीवों के सबसे प्रबल शत्रु माने गए हैं, जो यहाँ मनुष्यों को चारों ओर से घेरे हुए हैं।
श्लोक 4: वे हमेशा सतर्क रहते हैं और लापरवाह व्यक्ति को बहुत कष्ट देते हैं। जैसे ही वे किसी मनुष्य को देखते हैं, भेड़ियों की तरह उस पर बलपूर्वक टूट पड़ते हैं।
श्लोक 5: नरश्रेष्ठ! इनके कारण ही सभी को दुःख प्राप्त होता है, इनकी प्रेरणा से ही मनुष्य में पाप करने की प्रवृत्ति होती है। प्रत्येक मनुष्य को इसका सदैव ध्यान रखना चाहिए। 5॥
श्लोक 6-7h: पृथ्वीनाथ! अब मैं तुम्हें बताता हूँ कि वे कहाँ से उत्पन्न होते हैं? वे कैसे स्थिर रहते हैं? और कैसे नष्ट होते हैं? हे राजन! सबसे पहले मैं क्रोध की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन करूँगा। इस विषय को एकाग्र होकर सुनो। 6 1/2।
श्लोक 7-8h: राजा! क्रोध लोभ से उत्पन्न होता है, दूसरों के दोष देखने से बढ़ता है, क्षमा से रुकता है और क्षमा से ही दूर होता है।
श्लोक 8-9h: इच्छा विचार से उत्पन्न होती है। यदि उसमें लीन रहा जाए तो वह बढ़ती है और जब बुद्धिमान व्यक्ति उससे विरक्त हो जाता है तो वह (इच्छा) तत्काल नष्ट हो जाती है। 8 1/2
श्लोक 9-10: परसुता क्रोध, लोभ तथा अभ्यास से प्रकट होती है। वह समस्त प्राणियों के प्रति दया और वैराग्य से निवृत्त होती है। वह पाप दर्शन से उत्पन्न होती है और ज्ञानी पुरुषों के दर्शन से नष्ट हो जाती है। 9-10॥
श्लोक 11: आसक्ति अज्ञान से उत्पन्न होती है और पापों के बार-बार करने से बढ़ती है। जब मनुष्य विद्वानों में अनुराग उत्पन्न करता है, तो उसकी आसक्ति तुरन्त नष्ट हो जाती है ॥11॥
श्लोक 12: हे कुरुश्रेष्ठ! जो लोग धर्म के विरुद्ध शास्त्रों का पालन करते हैं, उनके मन में गलत कर्म करने की इच्छा उत्पन्न होती है। वह दर्शन से निवृत्त हो जाता है। 12॥
श्लोक 13: दुःख तब उत्पन्न होता है जब कोई अपने प्रिय व्यक्ति से वियोग पाता है। किन्तु जब मनुष्य यह समझ लेता है कि दुःख व्यर्थ है और उससे कोई लाभ नहीं है, तो दुःख तुरन्त दूर हो जाता है ॥13॥
श्लोक 14: परसुत अर्थात् दूसरों को मारने की इच्छा क्रोध, लोभ और आदत के कारण होती है। सभी जीवों के प्रति दया और वैराग्य रखने से मनुष्य निवृत्ति को प्राप्त होता है। 14॥
श्लोक 15: सत्य का त्याग करने और दुष्टों की संगति करने से मत्स्य दोष उत्पन्न होता है। तत्! महापुरुषों की सेवा और संगति करने से यह दोष नष्ट हो जाता है। 15॥
श्लोक 16: अहंकारी मनुष्य अपने उत्तम कुल, उत्तम विद्या और धन का अभिमान करके अहंकारी हो जाते हैं; किन्तु अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेने पर उनका अहंकार तुरन्त ही नष्ट हो जाता है ॥16॥
श्लोक 17: मन में कामनाएँ रखने और दूसरे प्राणियों के सुख और आनन्द को देखने से ईर्ष्या उत्पन्न होती है और विवेकशील मन से उसका नाश हो जाता है ॥17॥
श्लोक 18: राजन! समाज से बहिष्कृत नीच मनुष्यों के कुत्सित और अप्रामाणिक वचन सुनकर भ्रमित होकर निन्दा करने की आदत पड़ जाती है; किन्तु महापुरुषों को देखकर वह शान्त हो जाती है॥18॥
श्लोक 19: जो मनुष्य अपने ऊपर अत्याचार करने वाले बलवान व्यक्ति से बदला लेने में असमर्थ होते हैं, उनके हृदय में तीव्र असूया (दोष देखने की प्रवृत्ति) उत्पन्न हो जाती है, किन्तु दया का भाव जागृत होने से वह नष्ट हो जाती है ॥19॥
श्लोक 20: सदैव कंजूस लोगों को देखने से हमारे अन्दर कंजूसी और कृपणता की भावना उत्पन्न होती है; धार्मिक पुरुषों के उदार स्वभाव को जानने पर वह कंजूसी की भावना लुप्त हो जाती है।
श्लोक 21: सांसारिक सुखों के लिए जीवों में जो लोभ दिखाई देता है, वह अज्ञान के कारण है। जब मनुष्य सुखों की क्षणभंगुरता को देख और समझ लेता है, तो वह लोप हो जाता है ॥21॥
श्लोक 22-23: कहा गया है कि शांति को अपनाने से इन तेरह दोषों पर विजय पाई जा सकती है। ये सब दोष धृतराष्ट्र के पुत्रों में थे और आप सत्य को ग्रहण करना चाहते थे; इसलिए आपने श्रेष्ठ पुरुषों का संग करके उन सबको जीत लिया।॥ 22-23॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥