श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 162: सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.162.25 
उपैति सत्याद् दानं हि तथा यज्ञा: सदक्षिणा:।
त्रेताग्निहोत्रं वेदाश्च ये चान्ये धर्मनिश्चया:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य दान का, दक्षिणा सहित यज्ञ का, तीन प्रकार की अग्नियों में आहुति देने का, वेदों का तथा धर्म का स्वरूप निश्चित करने वाले अन्य शास्त्रों का अध्ययन करने का फल सत्य के द्वारा प्राप्त करता है ॥25॥
 
A man attains the fruits of charity, of sacrifices with dakshina, of offerings in the three kinds of fires, of studying the Vedas and of the other scriptures that decide the nature of religion, through truth. ॥25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)