श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 162: सत्यके लक्षण, स्वरूप और महिमाका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.162.17 
त्याग: स्नेहस्य यत् त्यागो विषयाणां तथैव च।
रागद्वेषप्रहीणस्य त्यागो भवति नान्यथा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
विषयों में आसक्ति का त्याग ही वास्तविक त्याग है। राग-द्वेष से मुक्त होने पर ही त्याग की सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं (परमात्मा के चिंतन का नाम ही 'ध्यान' है)। 17॥
 
The renunciation of attachment to objects is the real renunciation. Renunciation is accomplished only when one is free from attachment and hatred, not otherwise (the very name of thinking about God is 'meditation'). 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)