Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.161.10: इस संसार में धार्मिक लोग अपने धर्म की रक्षा के लिए अपनी इंद्रियों को वश में रखते हैं, जो स्वर्ग का साधन है। किन्तु धर्म और धन दोनों की सिद्धि के लिए तप ही सर्वोत्तम साधन है और उपवास से बढ़कर कोई तप नहीं है। 10॥ | mahabharat अध्याय 12.161: तपकी महिमा । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इन्द्रियाणीह रक्षन्ति स्वर्गधर्माभिगुप्तये।
तस्मादर्थे च धर्मे च तपो नानशनात् परम्॥ १०॥
अनुवाद
इस संसार में धार्मिक लोग अपने धर्म की रक्षा के लिए अपनी इंद्रियों को वश में रखते हैं, जो स्वर्ग का साधन है। किन्तु धर्म और धन दोनों की सिद्धि के लिए तप ही सर्वोत्तम साधन है और उपवास से बढ़कर कोई तप नहीं है। 10॥
In this world, religious people keep their senses under control to protect their religion which is the means of heaven. But for the accomplishment of both religion and wealth, penance is the best means and there is no penance greater than fasting. 10॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥