श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.160.4 
धर्मस्य महतो राजन् बहुशाखस्य तत्त्वत:।
यन्मूलं परमं तात तत् सर्वं ब्रूह्यशेषत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
राजा! इस महान धर्म का वास्तविक मूल क्या है, जिसकी इतनी शाखाएँ हैं? पिता! कृपया मुझे ये सब बातें विस्तारपूर्वक बताइए।॥4॥
 
King! What is the real root of this great religion which has so many branches? Father! Please tell me all these things in detail. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)