श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  12.160.38 
पुनश्च परिपप्रच्छ भीष्मं धर्मभृतां वरम्।
तप: प्रति स चोवाच तस्मै सर्वं कुरूद्वह॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उन्होंने धर्मात्माओं में श्रेष्ठ भीष्मजी से पुनः तप के विषय में पूछा। तब भीष्मजी ने उन्हें अपना सब हाल कहना आरम्भ किया॥38॥
 
Kurushrestha! After that, he again asked Bhishmaji, the best among the religious souls, about penance. Then Bhishmaji started telling them everything about him. 38॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि दमकथने षष्टॺधिकशततमोऽध्याय:॥ १६०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें दमका वर्णनविषयक एक सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १६०॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)