श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.160.37 
वैशम्पायन उवाच
एतद् भीष्मस्य वचनं श्रुत्वा राजा युधिष्ठिर:।
अमृतेनेव संतृप्त: प्रहृष्ट: समपद्यत॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं: जनमेजय! भीष्म के ये वचन सुनकर राजा युधिष्ठिर अत्यन्त प्रसन्न हुए, मानो अमृत पीकर तृप्त हो गये हों।
 
Vaishmpayana says: Janamejaya! On hearing these words of Bhishma, King Yudhishthira became very happy, as if he had become satiated after drinking nectar.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)