श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.160.35 
एकोऽस्य सुमहाप्राज्ञ दोष: स्यात् सुमहान् गुण:।
क्षमया विपुला लोका: सुलभा हि सहिष्णुता॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
हे महापुरुष युधिष्ठिर! उनका यह एक दोष ही महान् गुण बन सकता है। क्षमाशील होने से उन्हें अनेक पुण्य लोकों की प्राप्ति होती है। साथ ही क्षमाशीलता भी आती है। ॥35॥
 
O great Yudhishthira! This one flaw of his can become a great virtue. By being forgiving, he gets access to many virtuous worlds. Along with this, forgiveness also brings tolerance. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)