श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.160.34 
एक एव दमे दोषो द्वितीयो नोपपद्यते।
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जन:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
संयम में एक ही दोष है, दूसरा नहीं। वह यह कि उसके क्षमाशील होने के कारण लोग उसे अयोग्य समझने लगते हैं ॥34॥
 
There is only one flaw in self-control, no other. It is that because of his being forgiving, people start considering him incapable. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)