श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.160.33 
ज्ञानारामस्य बुद्धस्य सर्वभूताविरोधिन:।
नावृत्तिभयमस्तीह परलोकभयं कुत:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
जो किसी भी प्राणी से वैर नहीं करता और जो ज्ञानस्वरूप आत्मा में लीन रहता है, ऐसे ज्ञानी पुरुष को इस लोक में जन्म लेने का भय नहीं रहता, फिर उसे परलोक का भय कैसे हो सकता है ?॥ 33॥
 
He who has no enmity with any living being and who remains absorbed in the soul which is the embodiment of knowledge, such a wise person has no fear of being born again in this world. How can he then have fear of the next world?॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)