श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.160.28 
शकुनीनामिवाकाशे जले वारिचरस्य च।
यथा गतिर्न दृश्येत तथा तस्य न संशय:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
जैसे आकाश में पक्षियों के और जल में जलचरों के पदचिह्न नहीं देखे जा सकते, वैसे ही ज्ञानी पुरुष की गति भी नहीं जानी जा सकती। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ॥28॥
 
Just as the footprints of birds in the sky and aquatic animals in water cannot be seen, similarly the movements of a wise person cannot be known. There is no doubt in this at all. ॥28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)