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mahabharat 12.160.27: वह भोग-विलास से प्रारब्ध कर्मों को क्षीण करता है और कर्मों के अभिमान तथा फल प्राप्ति की शक्ति से रहित होने के कारण नये कर्मों का संचय नहीं करता। वह सब प्राणियों में समभाव रखकर मित्र के समान सबको संरक्षण देता हुआ विचरण करता है। 27॥   |   mahabharat अध्याय 12.160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  12.160.27 
अवाचिनोति कर्माणि न च सम्प्रचिनोति ह।
सम: सर्वेषु भूतेषु मैत्रायणगतिश्चरेत्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
वह भोग-विलास से प्रारब्ध कर्मों को क्षीण करता है और कर्मों के अभिमान तथा फल प्राप्ति की शक्ति से रहित होने के कारण नये कर्मों का संचय नहीं करता। वह सब प्राणियों में समभाव रखकर मित्र के समान सबको संरक्षण देता हुआ विचरण करता है। 27॥
 
He diminishes the destiny deeds by consumption and does not accumulate new deeds due to being void of pride in his actions and power to reap the benefits. Having equality among all living beings, he roams around giving protection to everyone like a friend. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)