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mahabharat 12.160.20: मैं तुमसे प्रेम करता हूँ और तुम मुझसे प्रेम करते हो। वे मुझसे प्रेम करते हैं और मैं उनसे प्रेम करता हूँ।’ इस प्रकार, जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह अपने पूर्व सम्बन्धियों के सम्बन्ध के विषय में नहीं सोचता। 20.   |   mahabharat अध्याय 12.160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.160.20 
अहं त्वयि मयि त्वं च मयि ते तेषु चाप्यहम्।
पूर्वसम्बन्धिसंयोगं नैतद् दान्तो निषेवते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
मैं तुमसे प्रेम करता हूँ और तुम मुझसे प्रेम करते हो। वे मुझसे प्रेम करते हैं और मैं उनसे प्रेम करता हूँ।’ इस प्रकार, जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में कर लिया है, वह अपने पूर्व सम्बन्धियों के सम्बन्ध के विषय में नहीं सोचता। 20.
 
'I love you and you love me. They love me and I love them.' In this way, a person who has controlled his senses does not think about the relationship of his previous relatives. 20.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)