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mahabharat 12.160.13: जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ और मन उसके वश में नहीं हैं, वह निरन्तर दुःख भोगता है। इसके अतिरिक्त, वह अपने ही दोषों के कारण अनेक अनर्थ भी उत्पन्न करता है॥13॥   |   mahabharat अध्याय 12.160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.160.13 
अदान्त: पुरुष: क्लेशमभीक्ष्णं प्रतिपद्यते।
अनर्थांश्च बहूनन्यान् प्रसृजत्यात्मदोषजान्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ और मन उसके वश में नहीं हैं, वह निरन्तर दुःख भोगता है। इसके अतिरिक्त, वह अपने ही दोषों के कारण अनेक अनर्थ भी उत्पन्न करता है॥13॥
 
A person whose senses and mind are not under his control, constantly suffers. Besides, he also creates many other calamities due to his own faults.॥ 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)