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mahabharat 12.160.11: नरेन्द्र! जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों और मन को वश में रखता है, वह महान धर्म को प्राप्त करता है। वह इस लोक और परलोक में भी परम सुख पाता है। 11॥   |   mahabharat अध्याय 12.160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.160.11 
प्रेत्य चात्र मनुष्येन्द्र परमं विन्दते सुखम्।
दमेन हि समायुक्तो महान्तं धर्ममश्नुते॥ ११॥
 
 
अनुवाद
नरेन्द्र! जो मनुष्य अपनी इन्द्रियों और मन को वश में रखता है, वह महान धर्म को प्राप्त करता है। वह इस लोक और परलोक में भी परम सुख पाता है। 11॥
 
Narendra! A man with control over his senses and mind attains great religion. He finds ultimate happiness in this world and the next world also. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)