श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 160: मन और इन्द्रियोंके संयमरूप दमका माहात्म्य  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.160.1 
युधिष्ठिर उवाच
स्वाध्याये कृतयत्नस्य नरस्य च पितामह।
धर्मकामस्य धर्मात्मन् किं नु श्रेय इहोच्यते॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा, 'हे धर्मात्मा पितामह! जो व्यक्ति अध्ययन में तत्पर रहता है और धर्म के मार्ग पर चलने की इच्छा रखता है, उसे इस संसार में क्या लाभ है?'
 
Yudhishthira asked, 'O righteous grandfather! What is the benefit in this world for a person who is diligent in his studies and desires to follow the path of Dharma?'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)