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mahabharat 12.16.3: जनेश्वर! मैंने मन में कई बार निश्चय किया है कि 'मैं अब नहीं बोलूँगा, मैं नहीं बोलूँगा;' परन्तु महान दुःख के कारण मुझे बोलना पड़ रहा है। कृपया मेरी बात सुनिए।   |   mahabharat अध्याय 12.16: भीमसेनका राजाको भुक्त दु:खोंकी स्मृति कराते हुए मोह छोड़कर मनको काबूमें करके राज्यशासन और यज्ञके लिये प्रेरित करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 16: भीमसेनका राजाको भुक्त दु:खोंकी स्मृति कराते हुए मोह छोड़कर मनको काबूमें करके राज्यशासन और यज्ञके लिये प्रेरित करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.16.3 
न वक्ष्यामि न वक्ष्यामीत्येवं मे मनसि स्थितम्।
अतिदु:खात्तु वक्ष्यामि तन्निबोध जनाधिप॥ ३॥
 
 
अनुवाद
जनेश्वर! मैंने मन में कई बार निश्चय किया है कि 'मैं अब नहीं बोलूँगा, मैं नहीं बोलूँगा;' परन्तु महान दुःख के कारण मुझे बोलना पड़ रहा है। कृपया मेरी बात सुनिए।
 
'Janeshwar! I have decided many times in my mind that 'I will not speak now, I will not speak;' but due to the great sorrow I have to speak. Please listen to me.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)