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mahabharat 12.159.5: पृथ्वीनाथ! मैं इस विषय को यथार्थ रूप में तथा विस्तृत विश्लेषण सहित सुनना चाहता हूँ; क्योंकि हम जो दुःख भोग रहे हैं, उसका कारण अज्ञान ही है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 12.159: अज्ञान और लोभको एक दूसरेका कारण बताकर दोनोंकी एकता करना और दोनोंको ही समस्त दोषोंका कारण सिद्ध करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 159: अज्ञान और लोभको एक दूसरेका कारण बताकर दोनोंकी एकता करना और दोनोंको ही समस्त दोषोंका कारण सिद्ध करना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.159.5 
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन यथावदिह पार्थिव।
अज्ञानप्रसवं हीदं यद् दु:खमुपलभ्यते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वीनाथ! मैं इस विषय को यथार्थ रूप में तथा विस्तृत विश्लेषण सहित सुनना चाहता हूँ; क्योंकि हम जो दुःख भोग रहे हैं, उसका कारण अज्ञान ही है ॥5॥
 
Prithvinath! I wish to hear this matter in its true form and with detailed analysis; because the cause of the suffering that we are experiencing is ignorance. ॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)