श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  12.158.6-7 
अत्यागश्चातितर्षश्च विकर्मसु च या: क्रिया:।
कुलविद्यामदश्चैव रूपैश्वर्यमदस्तथा॥ ६॥
सर्वभूतेष्वभिद्रोह: सर्वभूतेष्वसत्कृति:।
सर्वभूतेष्वविश्वास: सर्वभूतेष्वनार्जवम्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
लोभ से कृपणता, अत्यधिक तृष्णा, शास्त्रविरुद्ध कर्म करने की प्रवृत्ति, कुल और विद्या का अभिमान, रूप और ऐश्वर्य का अभिमान, सभी प्राणियों के प्रति द्रोह, सबका तिरस्कार, सब पर अविश्वास और कुटिल आचरण उत्पन्न होता है। 6-7॥
 
Greed leads to miserliness, excessive craving, tendency to do things contrary to the scriptures, pride in family and education, pride in beauty and opulence, treachery towards all living beings, contempt for everyone, mistrust towards everyone and devious behaviour. 6-7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)