श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  12.158.4 
लोभात् क्रोध: प्रभवति लोभात् काम: प्रवर्तते।
लोभान्मोहश्च माया च मान: स्तम्भ: परासुता॥ ४॥
 
 
अनुवाद
लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है, लोभ से काम उत्पन्न होता है और लोभ से ही माया, मोह, मान, अहंकार, दासता और गुलामी आदि दुर्गुण उत्पन्न होते हैं ॥4॥
 
Anger arises from greed, lust arises from greed, and vices like illusion, infatuation, pride, arrogance, servility and slavery emerge from greed. ॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)