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mahabharat 12.158.31: वे भय, क्रोध, अशान्ति और शोक से रहित हैं। वे पाखण्डी नहीं हैं और किसी गुप्त पाखण्ड धर्म का आश्रय नहीं लेते ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 12.158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.158.31 
न भयं क्रोधचापल्ये न शोकस्तेषु विद्यते।
न धर्मध्वजिनश्चैव न गुह्यं कञ्चिदास्थिता:॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वे भय, क्रोध, अशान्ति और शोक से रहित हैं। वे पाखण्डी नहीं हैं और किसी गुप्त पाखण्ड धर्म का आश्रय नहीं लेते ॥31॥
 
They are free from fear, anger, restlessness and grief. They are not hypocrites and do not take shelter of any secret, hypocritical religion. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)