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mahabharat 12.158.30: युधिष्ठिर! उनका धर्म-पालन धन-संचय या यश-लाभ के लिए नहीं है। वे धर्म और शारीरिक कर्मों को अपना आवश्यक कर्तव्य मानकर करते हैं॥30॥   |   mahabharat अध्याय 12.158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.158.30 
न धनार्थं यशोऽर्थं वा धर्मस्तेषां युधिष्ठिर।
अवश्यं कार्य इत्येव शरीरस्य क्रियास्तथा॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! उनका धर्म-पालन धन-संचय या यश-लाभ के लिए नहीं है। वे धर्म और शारीरिक कर्मों को अपना आवश्यक कर्तव्य मानकर करते हैं॥30॥
 
Yudhishthira! Their observance of Dharma is not for accumulating wealth or earning fame. They perform Dharma and physical activities considering them to be their necessary duties.॥ 30॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)