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mahabharat 12.158.21: कुरुनन्दन! जिन मनुष्यों का मन लोभ, लालच, क्रोध, मद, दुःस्वप्न, हर्ष, शोक और अति अभिमान में उलझा हुआ है, उनमें ये ही दोष दिखाई देते हैं। 21॥   |   mahabharat अध्याय 12.158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.158.21 
दर्प: क्रोधो मद: स्वप्नो हर्ष: शोकोऽतिमानिता।
एत एव हि कौरव्य दृश्यन्ते लुब्धबुद्धिषु॥ २१॥
 
 
अनुवाद
कुरुनन्दन! जिन मनुष्यों का मन लोभ, लालच, क्रोध, मद, दुःस्वप्न, हर्ष, शोक और अति अभिमान में उलझा हुआ है, उनमें ये ही दोष दिखाई देते हैं। 21॥
 
Kurunandan! In those people whose mind is entangled in greed, greed, anger, drunkenness, nightmare, joy, sorrow and extreme pride - these are the only faults seen. 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)