श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.158.20 
धर्मस्य ह्रियमाणस्य लोभग्रस्तैर्दुरात्मभि:।
या या विक्रियते संस्था तत: सापि प्रपद्यते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
लोभी दुष्टबुद्धि पुरुषों द्वारा धर्म की जो भी स्थिति हरण (विकृत) कर ली जाती है, बिगड़ जाती है या बदल जाती है, वह पुनः उसी रूप में प्रचलित हो जाती है ॥20॥
 
Whatever condition of Dharma which is abducted (distorted) by greedy evil-minded men, gets spoiled or changed, it becomes prevalent in the same form again. ॥20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)