स लोभ: सह मोहेन विजेतव्यो जितात्मना।
दम्भो द्रोहश्च निन्दा च पैशुन्यं मत्सरस्तथा॥ १५॥
भवन्त्येतानि कौरव्य लुब्धानामकृतात्मनाम्।
अनुवाद
जिस पुरुष ने अपने मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया है, उसे आसक्ति सहित लोभ को भी जीत लेना चाहिए। हे कृष्णपुत्र! अहंकार, छल, निन्दा, चुगली और ईर्ष्या- ये सब दोष उन लोभी पुरुषों में ही पाए जाते हैं, जिन्होंने अपनी आत्मा को नहीं जीता है। ॥15 1/2॥
A man who has controlled his mind and senses should conquer greed along with attachment. O son of Krishna! Arrogance, treachery, slander, gossip and envy – all these defects are found only in greedy men who have not conquered their souls. ॥15 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)