श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण  »  श्लोक 11-13h
 
 
श्लोक  12.158.11-13h 
जातौ बाल्ये च कौमारे यौवने चापि मानवा:॥ ११॥
न संत्यजन्त्यात्मकर्म यो न जीर्यति जीर्यत:।
यो न पूरयितुं शक्यो लोभ: प्राप्त्या कुरूद्वह॥ १२॥
नित्यं गम्भीरतोयाभिरापगाभिरिवोदधि:।
 
 
अनुवाद
हे कुरुश्रेष्ठ! लोभ ही वह कारण है जिसके कारण मनुष्य जन्म से लेकर बाल्यकाल, युवावस्था और किशोरावस्था में अपने पापकर्मों का त्याग नहीं कर पाता और जो वृद्धावस्था में भी नष्ट नहीं होता। जिस प्रकार अनेक गहरी जल वाली नदियों के मिल जाने पर भी सागर नहीं भरता, उसी प्रकार लोभ का पेट चाहे कितनी ही वस्तुएँ प्राप्त कर लें, कभी नहीं भरता।
 
O best of the Kurus! Greed is the reason that a man is unable to give up his evil deeds at birth, in childhood, in youth and adolescence, and which does not fade away even when he grows old. Just as the ocean is not filled even when many rivers with deep waters join together, similarly, no matter how many things one gains, the stomach of greed is never satiated.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)