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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 158: समस्त अनर्थोंका कारण लोभको बताकर उससे होनेवाले विभिन्न पापोंका वर्णन तथा श्रेष्ठ महापुरुषोंके लक्षण
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श्लोक 1
श्लोक
12.158.1
युधिष्ठिर उवाच
पापस्य यदधिष्ठानं यत: पापं प्रवर्तते।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं तत्त्वेन भरतर्षभ॥ १॥
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - 'भरतश्रेष्ठ! मैं वास्तव में यह सुनना चाहता हूँ कि पाप का मूल क्या है और वह किससे उत्पन्न होता है?॥1॥
Yudhishthira asked, 'Best of the Bharatas! I really want to hear what is the foundation of sin and from whom does it originate?॥ 1॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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