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mahabharat 12.157.5-6: वायु ने कहा- शाल्मले! मैं भी क्रोधवश तुम्हें ऐसा ही बनाना चाहता था। तुमने स्वयं ही इस कष्ट को स्वीकार किया है, तुम्हारी शाखाएँ गिर गई हैं, फूल, पत्ते, शाखाएँ और अंकुर सभी नष्ट हो गए हैं। तुमने अपनी दुष्ट बुद्धि से इस विपत्ति को आमंत्रित किया है। तुम मेरे बल और पराक्रम के शिकार हुए हो।॥5-6॥   |   mahabharat अध्याय 12.157: सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवान‍्के साथ वैर न करनेका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 157: सेमलका हार स्वीकार करना तथा बलवान‍्के साथ वैर न करनेका उपदेश  »  श्लोक 5-6
 
 
श्लोक  12.157.5-6 
वायुरुवाच
अहमप्येवमेव त्वां कुर्वाण: शाल्मले रुषा।
आत्मना यत्कृतं कृच्छ्रं शाखानामपकर्षणम्॥ ५॥
हीनपुष्पाग्रशाखस्त्वं शीर्णांकुरपलाशक:।
आत्मदुर्मन्त्रितेनेह मद्वीर्यवशग: कृत:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वायु ने कहा- शाल्मले! मैं भी क्रोधवश तुम्हें ऐसा ही बनाना चाहता था। तुमने स्वयं ही इस कष्ट को स्वीकार किया है, तुम्हारी शाखाएँ गिर गई हैं, फूल, पत्ते, शाखाएँ और अंकुर सभी नष्ट हो गए हैं। तुमने अपनी दुष्ट बुद्धि से इस विपत्ति को आमंत्रित किया है। तुम मेरे बल और पराक्रम के शिकार हुए हो।॥5-6॥
 
Vayu said- Shaalmale! I too wanted to make you like this in anger. You yourself have accepted this suffering, your branches have fallen, flowers, leaves, branches and sprouts have all been destroyed. You have invited this calamity with your own evil mind. You have become a victim of my strength and valour. ॥ 5-6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)