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mahabharat 12.155.2: शालमाल! ऐसा प्रतीत होता है कि तुम वायु के सामने बहुत विनम्र होकर कहते हो, 'मैं तुम्हारा हूँ।' इसीलिए वायु सदैव तुम्हारी रक्षा करती है॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 12.155: नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 155: नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.155.2 
न्यग्भावं परमं वायो: शाल्मले त्वमुपागत:।
तवाहमस्मीति सदा येन रक्षति मारुत:॥ २॥
 
 
अनुवाद
शालमाल! ऐसा प्रतीत होता है कि तुम वायु के सामने बहुत विनम्र होकर कहते हो, 'मैं तुम्हारा हूँ।' इसीलिए वायु सदैव तुम्हारी रक्षा करती है॥ 2॥
 
Shaalmale! It seems that you are very polite before the wind and say, 'I am yours'. That is why the wind always protects you.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)