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mahabharat 12.155.1: नारदजी बोले- शाल्मले! इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम्हें अपना भाई या मित्र मानने के कारण ही सर्वत्र विचरण करने वाले भयंकर वायुदेव सदैव तुम्हारी रक्षा करते हैं॥1॥   |   mahabharat अध्याय 12.155: नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 155: नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.155.1 
नारद उवाच
बन्धुत्वादथवा सख्याच्छाल्मले नात्र संशय:।
पालयत्येव सततं भीम: सर्वत्रगोऽनिल:॥ १॥
 
 
अनुवाद
नारदजी बोले- शाल्मले! इसमें कोई संदेह नहीं कि तुम्हें अपना भाई या मित्र मानने के कारण ही सर्वत्र विचरण करने वाले भयंकर वायुदेव सदैव तुम्हारी रक्षा करते हैं॥1॥
 
Naradji said-Shalmale! There is no doubt that it is because of considering you as his brother or friend that the terrible Vayudev, who travels everywhere, always protects you. 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)