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mahabharat 12.152.7: हे पृथ्वीनाथ! यज्ञ, दान, दया, वेद और सत्य - ये पाँच पवित्र माने गए हैं। इनके साथ ही विधिपूर्वक किया गया तप भी छठा पवित्र कर्म माना गया है।   |   mahabharat अध्याय 12.152: इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 152: इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.152.7 
यज्ञो दानं दया वेदा: सत्यं च पृथिवीपते।
पञ्चैतानि पवित्राणि षष्ठं सुचरितं तप:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
हे पृथ्वीनाथ! यज्ञ, दान, दया, वेद और सत्य - ये पाँच पवित्र माने गए हैं। इनके साथ ही विधिपूर्वक किया गया तप भी छठा पवित्र कर्म माना गया है।
 
Prithvinath! Yajna, charity, mercy, Vedas and truth - these five are considered sacred. Along with these, penance which is practised properly is also considered the sixth sacred deed. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)