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mahabharat 12.152.6: यदि कोई कार्य बिना सोचे-समझे आरम्भ किया जाए, तो वह कायरतापूर्ण दोष है; किन्तु यदि सोच-विचारकर कोई कार्य किया जाए, तो वह पुण्य माना जाता है ॥6॥   |   mahabharat अध्याय 12.152: इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 152: इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.152.6 
एतदेव हि कार्पण्यं समग्रमसमीक्षितम्।
यच्चेत् समीक्षयैव स्याद् भवेत् तस्मिंस्ततो गुण:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई कार्य बिना सोचे-समझे आरम्भ किया जाए, तो वह कायरतापूर्ण दोष है; किन्तु यदि सोच-विचारकर कोई कार्य किया जाए, तो वह पुण्य माना जाता है ॥6॥
 
If a task is started without giving due thought to all matters, then it is a cowardly fault; but if a task is done after due consideration, then it is considered a virtue. ॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)