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mahabharat 12.152.31: जो मनुष्य अघमर्षण मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र ही समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और सर्वत्र सम्मानित होता है। जड़ और मूक आदि सभी प्राणी उस पर प्रसन्न होते हैं ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 12.152: इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 152: इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.152.31 
तत् क्षिप्रं नुदते पापं सत्कारं लभते तथा।
अपि चैनं प्रसीदन्ति भूतानि जडमूकवत्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अघमर्षण मन्त्र का जप करता है, वह शीघ्र ही समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और सर्वत्र सम्मानित होता है। जड़ और मूक आदि सभी प्राणी उस पर प्रसन्न होते हैं ॥31॥
 
The person who chants the Aghamarshan Mantra soon gets rid of all his sins and is respected everywhere. All living beings, like the inanimate and the mute, become pleased with him. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)