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mahabharat 12.152.23: यदि कोई व्यक्ति शास्त्रविरुद्ध कर्म करता है, तो जो मनुष्य उसका पश्चाताप करता है, वह पाप से मुक्त हो जाता है। यदि वह दूसरी बार पाप करता है, तो 'मैं ऐसा कर्म फिर कभी नहीं करूँगा', ऐसी प्रतिज्ञा करके वह पाप से मुक्त हो सकता है।॥23॥   |   mahabharat अध्याय 12.152: इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 152: इन्द्रोतका जनमेजयको धर्मोपदेश करके उनसे अश्वमेधयज्ञका अनुष्ठान कराना तथा निष्पाप राजाका पुन: अपने राज्यमें प्रवेश  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.152.23 
विकर्मणा तप्यमान: पापाद् विपरिमुच्यते।
नैतत् कार्यं पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते॥ २३॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई व्यक्ति शास्त्रविरुद्ध कर्म करता है, तो जो मनुष्य उसका पश्चाताप करता है, वह पाप से मुक्त हो जाता है। यदि वह दूसरी बार पाप करता है, तो 'मैं ऐसा कर्म फिर कभी नहीं करूँगा', ऐसी प्रतिज्ञा करके वह पाप से मुक्त हो सकता है।॥23॥
 
If someone commits an act contrary to the scriptures, then the person who repents for it becomes free from sin. If he commits a sin a second time, then he can become free from sin by taking a vow that 'I will not commit such an act again'.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)