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mahabharat 12.151.22: जनमेजय बोले - हे ब्राह्मण! मैं आपके दोनों चरण स्पर्श करता हूँ और शपथ लेता हूँ कि मैं मन, वचन और कर्म से कभी भी ब्राह्मणों के साथ द्रोह नहीं करूँगा।   |   mahabharat अध्याय 12.151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.151.22 
जनमेजय उवाच
नैव वाचा न मनसा पुनर्जातु न कर्मणा।
द्रोग्धास्मि ब्राह्मणान् विप्र चरणावपि ते स्पृशे॥ २२॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय बोले - हे ब्राह्मण! मैं आपके दोनों चरण स्पर्श करता हूँ और शपथ लेता हूँ कि मैं मन, वचन और कर्म से कभी भी ब्राह्मणों के साथ द्रोह नहीं करूँगा।
 
Janamejaya said - O Brahmin! I touch both your feet and swear that I will never betray the Brahmins by my thoughts, words or actions.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि इन्द्रोतपारिक्षितीये एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें इन्द्रोत और पारिक्षितका संवाद विषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)