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जनमेजय उवाच
नैव वाचा न मनसा पुनर्जातु न कर्मणा।
द्रोग्धास्मि ब्राह्मणान् विप्र चरणावपि ते स्पृशे॥ २२॥
अनुवाद
जनमेजय बोले - हे ब्राह्मण! मैं आपके दोनों चरण स्पर्श करता हूँ और शपथ लेता हूँ कि मैं मन, वचन और कर्म से कभी भी ब्राह्मणों के साथ द्रोह नहीं करूँगा।
Janamejaya said - O Brahmin! I touch both your feet and swear that I will never betray the Brahmins by my thoughts, words or actions.
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि इन्द्रोतपारिक्षितीये एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १५१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें इन्द्रोत और पारिक्षितका संवाद विषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५१॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥