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mahabharat 12.151.15: जनमेजय ने कहा- शौनक! मुझे अपने पापों का बड़ा पश्चाताप हो रहा है, अब मैं धर्म का त्याग कभी नहीं करूँगा। मैं कल्याण चाहता हूँ; अतः आप मुझ भक्त पर प्रसन्न हों॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 12.151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.151.15 
जनमेजय उवाच
अनुतप्ये च पापेन न च धर्मं विलोपये।
बुभूषुं भजमानं च प्रीतिमान् भव शौनक॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जनमेजय ने कहा- शौनक! मुझे अपने पापों का बड़ा पश्चाताप हो रहा है, अब मैं धर्म का त्याग कभी नहीं करूँगा। मैं कल्याण चाहता हूँ; अतः आप मुझ भक्त पर प्रसन्न हों॥ 15॥
 
Janamejaya said- Shaunak! I feel very remorseful for my sins, now I will never abandon Dharma. I wish to attain welfare; therefore please be pleased with me, your devotee.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)