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mahabharat 12.151.11: जो शुद्ध बुद्धि के आसन पर चढ़कर स्वयं शोक से रहित होकर दूसरे दुःखी मनुष्यों के लिए शोक करता है, वह अपने ज्ञान के बल से सब कुछ उसी प्रकार समझ लेता है, जैसे पर्वत की चोटी पर खड़ा हुआ मनुष्य उस पर्वत के चारों ओर की भूमि पर रहने वाले सब लोगों को देख सकता है ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 12.151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 151: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.151.11 
प्रज्ञाप्रासादमारुह्य अशोच्य: शोचते जनान्।
जगतीस्थानिवाद्रिस्थ: प्रज्ञया प्रतिपत्स्यति॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जो शुद्ध बुद्धि के आसन पर चढ़कर स्वयं शोक से रहित होकर दूसरे दुःखी मनुष्यों के लिए शोक करता है, वह अपने ज्ञान के बल से सब कुछ उसी प्रकार समझ लेता है, जैसे पर्वत की चोटी पर खड़ा हुआ मनुष्य उस पर्वत के चारों ओर की भूमि पर रहने वाले सब लोगों को देख सकता है ॥11॥
 
He who, having climbed the pedestal of pure intellect and being free from grief himself, grieves for the other suffering persons, by the power of his knowledge understands everything in the same way as a man standing on the top of a mountain can see all the people living on the lands around that mountain. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)