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अध्याय 150: इन्द्रोत मुनिका राजा जनमेजयको फटकारना
 
श्लोक 1:  युधिष्ठिर ने पूछा, "हे भरतश्रेष्ठ! यदि कोई मनुष्य अनजाने में कोई पाप कर दे, तो उससे कैसे मुक्त हो सकता है? कृपया मुझे यह सब बताइए।"
 
श्लोक 2:  भीष्म बोले, 'हे राजन! इस विषय में मैं आपको एक प्राचीन कथा और उपदेश सुनाता हूँ, जिसकी ऋषियों ने प्रशंसा की है और जिसे शुनकवंशी ब्राह्मण इन्द्रौत ने राजा जनमेजय को सुनाया था।
 
श्लोक 3:  प्राचीन काल में परीक्षित के पुत्र राजा जनमेजय बहुत शक्तिशाली थे; किन्तु अनजाने में ही उन्होंने एक ब्राह्मण की हत्या का पाप कर दिया था।
 
श्लोक 4:  यह जानकर पुरोहितों सहित सभी ब्राह्मण जनमेजय को त्यागकर चले गए। राजा दिन-रात चिंता में जलते हुए वन में चले गए।
 
श्लोक 5:  उसकी प्रजा ने भी उसे गद्दी से उतार दिया था; इसलिए वह वन में रहकर महान पुण्य कर्म करने लगा। दुःख से जलता हुआ वह दीर्घकाल तक तपस्या करता रहा॥5॥
 
श्लोक 6:  राजा ने विश्व के कोने-कोने में जाकर अनेक ब्राह्मणों से ब्राह्मण-हत्या रोकने का उपाय पूछा।
 
श्लोक 7-8h:  राजन! मैं जो कथा आपसे कह रहा हूँ, वह धर्म की वृद्धि करने वाली है। राजा जनमेजय अपने पापों से जलकर वन में भटकते हुए, कठोर व्रत करने वाले शुनकवंशी इन्द्रौत ऋषि के पास गए।
 
श्लोक 8-10:  वहाँ जाकर उसने ऋषि के चरण पकड़ लिए और धीरे-धीरे दबाने लगा। राजा को वहाँ देखकर ऋषि ने उसे डाँटा। उन्होंने कहा, "अरे! तुम महापापी और ब्राह्मण-हत्यारे हो। तुम यहाँ कैसे आए? हमसे तुम्हारा क्या लेना-देना? हमें किसी भी प्रकार से स्पर्श मत करो। चले जाओ, हमें तुम्हारा यहाँ रहना अच्छा नहीं लगता।" 8-10
 
श्लोक 11:  तुम्हारे मुख से रक्त जैसी दुर्गन्ध आ रही है। तुम्हारा रूप मुर्दे के समान है। तुम शुभ दिखते हो, पर हो अशुभ। वास्तव में तुम मरे हुए हो, पर जीवित मनुष्य की भाँति विचरण कर रहे हो।॥11॥
 
श्लोक 12:  तुम ब्राह्मण की मृत्यु के कारण हो। तुम्हारा अन्तःकरण सर्वथा अशुद्ध है। तुम पाप का चिन्तन करते हुए जागते और सोते हो और इसी कारण अपने को परम सुखी मानते हो।॥12॥
 
श्लोक 13:  राजन्! तुम्हारा जीवन व्यर्थ और दुःखों से भरा है। तुम पाप करने के लिए ही जन्मे हो। तुम बुरे कर्म करने के लिए ही जन्मे हो।॥13॥
 
श्लोक 14:  माता-पिता तप, भगवान् की पूजा, नमस्कार और सहनशीलता या क्षमा आदि के द्वारा पुत्रों की प्राप्ति की इच्छा रखते हैं और प्राप्त पुत्रों से परम कल्याण की कामना करते हैं ॥14॥
 
श्लोक 15:  परन्तु तुम्हारे कारण तुम्हारे पूर्वजों का यह समुदाय नरक में गिर गया है। अपनी आँखें उठाकर उनकी दशा देखो। तुम्हारी ओर से उनकी जो आशाएँ थीं, वे सब आज नष्ट हो गईं॥15॥
 
श्लोक 16:  जिनकी पूजा से स्वर्ग, आयु, यश और संतान प्राप्त होती है, उन ब्राह्मणों से तुम सदैव द्वेष करते हो। तुम्हारा जीवन व्यर्थ है॥16॥
 
श्लोक 17:  इस संसार को छोड़कर तुम अपने पाप कर्मों के फलस्वरूप अनंत वर्षों तक सिर झुकाए हुए नरक में रहोगे॥ 17॥
 
श्लोक 18:  वहाँ लोहे के समान चोंच वाले गिद्ध और मोर तुम्हें नोच-नोच कर कष्ट देंगे और उसके बाद भी नरक से लौटने पर तुम्हें किसी पाप योनि में जन्म लेना पड़ेगा।
 
श्लोक 19:  हे राजन! तुम सोचते हो कि जब इस लोक में तुम्हें अपने पापों का फल नहीं मिलता, तो परलोक का अस्तित्व कैसे हो सकता है? अतः इस मान्यता के विपरीत, जब तुम यमलोक में जाओगे, तब यमराज के दूत तुम्हें इन सब बातों का स्मरण कराएँगे॥19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)