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mahabharat 12.15.57-58: जैसे मनुष्य बार-बार नए घरों में प्रवेश करता है, वैसे ही जीव भी अलग-अलग शरीर धारण करता है। पुराने शरीरों को छोड़कर नए शरीर धारण करता है। इसे ही दार्शनिक लोग मृत्यु का मुख कहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.15: अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 15: अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 57-58
 
 
श्लोक  12.15.57-58 
यथा हि पुरुष: शालां पुन: सम्प्रविशेन्नवाम्।
एवं जीव: शरीराणि तानि तानि प्रपद्यते॥ ५७॥
देहान् पुराणानुत्सृज्य नवान् सम्प्रतिपद्यते।
एवं मृत्युमुखं प्राहुर्जना ये तत्त्वदर्शिन:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
जैसे मनुष्य बार-बार नए घरों में प्रवेश करता है, वैसे ही जीव भी अलग-अलग शरीर धारण करता है। पुराने शरीरों को छोड़कर नए शरीर धारण करता है। इसे ही दार्शनिक लोग मृत्यु का मुख कहते हैं।
 
Just as a man repeatedly enters new houses, similarly the living being takes up different bodies. Leaves old bodies and adopts new bodies. This is what philosophical people call the face of death.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि अर्जुनवाक्ये पञ्चदशोऽध्याय:॥ १५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १५॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)