श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 15: अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 49
 
 
श्लोक  12.15.49 
लोकयात्रार्थमेवेह धर्मप्रवचनं कृतम्।
अहिंसासाधुहिंसेति श्रेयान् धर्मपरिग्रह:॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
लोकयात्रा की पूर्ति के लिए ही धर्म का प्रतिपादन किया गया है। जब यह प्रश्न उठे कि हिंसा बिल्कुल नहीं करनी चाहिए अथवा दुष्टों के प्रति हिंसा करनी चाहिए, तो धर्म की रक्षा करने वाले कर्म को ही श्रेष्ठ मानना ​​चाहिए। 49॥
 
Religion has been propounded only to fulfill the folk yatra. When the question arises whether violence should not be done at all or violence should be done to the wicked, the work which protects religion should be considered the best. 49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)