श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 15: अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  12.15.48 
अर्थे सर्वे समारम्भा: समायत्ता न संशय:।
स च दण्डे समायत्त: पश्य दण्डस्य गौरवम्॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
इसमें संदेह नहीं कि सब कर्म धन के अधीन हैं, परन्तु धन दण्ड के अधीन है। देखो, दण्ड की क्या महिमा है?॥48॥
 
There is no doubt that all works are subject to money, but money is subject to punishment. See, what is the glory of punishment?॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)