vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 15: अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन
»
श्लोक 44
श्लोक
12.15.44
न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृश्यते।
यत्र दण्ड: सुविहितश्चरत्यरिविनाशन:॥ ४४॥
अनुवाद
जहाँ शत्रुओं का नाश करने वाला दण्ड सुन्दर रीति से दिया जाता है, वहाँ छल, पाप और कपट नहीं दिखाई देते ॥44॥
Where the punishment that destroys the enemies is being administered in a beautiful manner, there deceit, sin and fraud are not seen. ॥ 44॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×