श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 15: अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  12.15.44 
न तत्र कूटं पापं वा वञ्चना वापि दृश्यते।
यत्र दण्ड: सुविहितश्चरत्यरिविनाशन:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
जहाँ शत्रुओं का नाश करने वाला दण्ड सुन्दर रीति से दिया जाता है, वहाँ छल, पाप और कपट नहीं दिखाई देते ॥44॥
 
Where the punishment that destroys the enemies is being administered in a beautiful manner, there deceit, sin and fraud are not seen. ॥ 44॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)