श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 15: अर्जुनके द्वारा राजदण्डकी महत्ताका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.15.1 
वैशम्पायन उवाच
याज्ञसेन्या वच: श्रुत्वा पुनरेवार्जुनोऽब्रवीत्।
अनुमान्य महाबाहुं ज्येष्ठं भ्रातरमच्युतम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - हे राजन! द्रुपदपुत्री के ये वचन सुनकर अर्जुन ने अपने बड़े भाई, मर्यादा से विचलित न होने वाले पराक्रमी युधिष्ठिर को प्रणाम करते हुए पुनः ऐसा कहा ॥1॥
 
Vaishmpayana says: O King! On hearing these words of the daughter of Drupada, Arjuna, while paying respects to his elder brother, the powerful Yudhishthira, who never deviated from his decorum, said this again. ॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)