श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 148: कबूतरीका विलाप और अग्निमें प्रवेश तथा उन दोनोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति  » 
 
 
अध्याय 148: कबूतरीका विलाप और अग्निमें प्रवेश तथा उन दोनोंको स्वर्गलोककी प्राप्ति
 
श्लोक 1:  भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर! शिकारी के चले जाने पर कबूतरी को अपने पति का स्मरण हो आया और वह अत्यन्त दुःखी हो गयी तथा दुःख के मारे रोने-चीखने लगी।
 
श्लोक 2:  प्रियतम! मुझे याद नहीं पड़ता कि तुमने मुझे कभी नाराज़ किया हो। सभी स्त्रियाँ, चाहे उनके कई पुत्र क्यों न हों, अपने पति को खो देने पर दुःख में डूब जाती हैं।
 
श्लोक 3:  पतिहीन स्त्री अपने भाइयों और सम्बन्धियों के लिए दुःख का कारण बनती है। तुमने मुझे सदैव लाड़-प्यार से पाला है और बड़े आदर से रखा है॥3॥
 
श्लोक 4-5:  तुमने मुझे अपने प्रेमपूर्ण, सुखद, मनोहर और मधुर वचनों से सुखी किया है। मैंने तुम्हारे साथ पर्वतों की कन्दराओं में, नदियों के तटों पर, झरनों के आसपास और वृक्षों की सुन्दर चोटियों पर आनन्द लिया है। मैं आकाश में भी तुम्हारे साथ सदैव सुखपूर्वक विचरण करता रहा हूँ।॥ 4-5॥
 
श्लोक 6-7h:  प्रिये! पहले मैं तुम्हारे साथ जिस प्रकार जीवन का आनन्द लेती थी, अब उन सुखों में से कुछ भी मेरे लिए शेष नहीं रहा। पिता, भाई और पुत्र - ये सभी लोग स्त्री को सीमित सुख देते हैं, केवल पति ही उसे असीमित या अनंत सुख देता है। कौन स्त्री ऐसे पति की पूजा नहीं करेगी?
 
श्लोक 7-8h:  स्त्री के लिए पति के समान कोई रक्षक नहीं है और पति के समान कोई सुख नहीं है। उसके लिए धन आदि सब कुछ त्याग देने के बाद पति ही उसका एकमात्र मोक्ष है।'
 
श्लोक 8-9h:  नाथ! आपके बिना इस जीवन का क्या उपयोग है? कौन पतिव्रता स्त्री अपने पति के बिना रह सकती है?॥8 1/2॥
 
श्लोक 9-10h:  इस प्रकार अनेक प्रकार से विलाप करता हुआ वह श्रद्धालु कबूतर महान शोक में डूबकर उसी प्रज्वलित अग्नि में समा गया ॥9 1/2॥
 
श्लोक 10-11h:  तत्पश्चात् उसने अपने पति को देखा, जो विचित्र आभूषण पहने हुए विमान में बैठे थे और अनेक पुण्यात्मा तथा महात्मा उनकी स्तुति कर रहे थे।
 
श्लोक 11-12h:  वह विचित्र हार और वस्त्र पहने हुए था और नाना प्रकार के आभूषणों से सुसज्जित था। पुण्यात्मा पुरुषों से युक्त करोड़ों विमान उसके चारों ओर थे।
 
श्लोक 12:  इस प्रकार उत्तम विमान पर बैठकर वह पक्षी अपनी पत्नी सहित स्वर्गलोक को गया और अपने पुण्यकर्मों से सम्मानित होकर वहाँ सुखपूर्वक रहने लगा ॥12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)