ततो यष्टिं शलाकां च क्षारकं पञ्जरं तथा।
तां च बद्धां कपोतीं स प्रमुच्य विससर्ज ह॥ ११॥
अनुवाद
उस समय उसने पकड़े हुए कबूतर को पिंजरे से मुक्त कर दिया और अपनी लाठी, डंडा, जाल और पिंजरा - सब कुछ वहीं छोड़ दिया ॥11॥
At that time, he released the captured pigeon from the cage and left behind his stick, rod, net and cage – everything. ॥11॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि लुब्धकोपरतौ सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्याय:॥ १४७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें बहेलियेकी उपरतिविषयक एक सौ सैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १४७॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)