श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 146: कबूतरके द्वारा अतिथि-सत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.146.7 
पञ्चयज्ञांस्तु यो मोहान्न करोति गृहाश्रमे।
तस्य नायं न च परो लोको भवति धर्मत:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
धर्म के अनुसार जो मनुष्य गृहस्थ अवस्था में रहते हुए भी पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान नहीं करता, वह न तो इस लोक को प्राप्त करता है और न ही परलोक को ॥7॥
 
According to Dharma, he who, despite being in the householder's stage, does not perform the five great sacrifices, neither attains this world nor the next. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)